गज़ल ~ गुलाबक' फुल


सुनु अहाँक बोली, नई रसगर बुझाइय,
सुनु अहाँक ठोली, नई चहटगर बुझाइय !!

देखने रहि जे अहाँक, गुलाबक' फुल,
देखिते अहाँक चोली, नै सुटगर बुझाइय !!

मन मे रोपने छली, हम प्रेमक' फुल,
अहँक चैतक' होली, नई मिठगर बुझाइय !!

राति' मे देखने छली जे, अँहिक सपना,
अहाँक मनक' बोली, नै उचितगर बुझाइय !!

जखन मिलैछी अहाँ, मुस्कुराइते जेना,
अहाँक नयनक' गोली, हमरा फिटगर बुझाइय !!
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__.✍ दिनेश कुमार राम 
सुगा मधुकरही - ६ धनुषा,
हाल : दोहा कतार